वेदोक्त नियम समान
परमात्मा ने जिस प्रकार के सूर्य, चन्द्र द्यौ, भूमि, अन्तरिक्ष और तत्रस्थ सुख विशेष पदार्थ पूर्व कल्प में रचे थे वैसे ही इस कल्प अर्थात इस सृष्टि में रचे हैं तथा सब लोकलोकान्तरों में भी बनाये हैं। भेद किचिन्मात्र नहीं होता।
महर्षि का यहाँ तक दावा है कि- जिस प्रकार हमारी पृथ्वी वेद हैं उसी प्रकार अन्य लोकलोकान्तरों में भी वेद का प्रकाश है। जिस प्रकार एक राजा के राज्य में एक से कानून होते हैं। उसी प्रकार राजराजेश्वर के पूरी सृष्टि में ऐसे ही नियम है। जिस प्रकार माता-पिता का सम्मान करना, दुष्टों, चोरों को दण्डित करने के नियम हैं और सज्जनों की रक्षा करना, उनका सम्मान करना हैं उसी प्रकार अन्य लोकलोकान्तर में भी इसी प्रकार के वेदोक्त नियम समान रूप से हैं। उनमें कोई भेद नहीं है।
महर्षि का यह भी दावा है कि- जैसे सांसारिक सुख शरीर के आधार से भोगता है। वैसे परमेश्वर के आधार मुक्ति के आनंद को जीवात्मा भोगता है। वह मुक्त जीव अनन्त व्यापक ब्रह्म में स्वच्छन्द धूपता, शुद्ध ज्ञान से सब सृष्टि को देखता, अन्य मुक्तों के साथ मिलता, सृष्टिविद्या को क्रम से देखता हुआ सब लोक लोकान्तरों अर्थात जितने ये लोक दिखते हैं और नहीं दिखते हैं उन सबमें घूमता है, वह सब पदार्थों, जो कि उसके ज्ञान के आगे हैं। देखता है जितना ज्ञान अधिक होता है उसको उतना ही आनन्द अधिक होता है।
Just as God created the sun, moon, sky, earth, space, and the special objects of happiness there in the previous Kalpa, He has created them in this Kalpa, that is, in this universe, and in all the other worlds as well. There is no difference whatsoever.
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